महिला सशक्तिकरण का भारतीय संस्करण:- साध्वी दीदी माँ ऋतंभरा

 

भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता और संस्कृति वाला देश है। एक ऐसा देश जिसने विश्व को सबसे पहले विश्वविद्यालय और शल्य चिकित्सा का ज्ञान दिया। एक देश जिसके वैभव की चकाचौंध ने लगभग समूचे विश्व को ही अपनी और आकर्षित किया। कुछ यहाँ के विश्वविद्यालयों में ज्ञानार्जन हेतु आये और इस कुछ लोग तुर्क, उज्बेक, मंगोल, पश्तून, अफ़ग़ान, अंग्रेज, डच, फ्रेंच जैसे विदेशी आक्रांताओं और व्यापारियों के रूप में, किन्तु इन सभी को इस देश के अग्रणी ज्ञान विज्ञान ने यूँ ही नहीं आकृष्ट किया। सोने की चिड़िया कहाने वाला ये देश यूँ ही जगतगुरु भी नहीं बना। इस वैभव, ज्ञान और विश्व के बाजार का केंद्र रहा भारत अपने उच्च आदर्शों और महान आचरण वाले महापुरुषों के नेतृत्व से इस शिखर पर रहा। इस महान नेतृत्व का सृजन संस्कारों के कठिन तप से हुआ जिसमें माता सीता जैसी माताओं ने ऐसे अद्भुत बालकों को संस्कारों की शिक्षा दी जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के साथ ध्यान, योग, मीमांसा, वेद, पुराण में उस समय के सर्वगुणसम्पन्न किशोर थे अपितु वीर योद्धा भी। 

भारत में सदा नारी का सम्मान रहा है, विदेशी आक्रांताओं के आक्रमणों से पूर्व भी जब एक राजा दूसरे राजा पर आक्रमण करता था तो एक दूसरे के पूजा स्थलों को भले नुकसान पहुँचाया जाता रहा हो किन्तु महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से ही देखा जाता रहा और इस नीति का पालन परम आदरणीय छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी किया। जिस देश में इतने उच्च आचरण का पालन किया जाता रहा, जिस ध्येय वाक्य को केंद्र में रखकर शासन व्यवस्था चलती रही आज उसी देश में नारी का अनादर और घृणा एक समाज के रूप में हमें शर्मिंदा कर जाती है। महिला आयोग, नारी निकेतन, महिलाओं का मंत्रालय जैसे शब्द हमें बताते हैं कि इस डिजिटल युग में "यत्र नारी पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता" जैसे ध्येय वाक्य अब उतने कारगर नहीं रहे और इसी लिए एक समाज, एक देश के रूप में हमारा नैतिक, सामाजिक और आर्थिक पतन हुआ है। 

हमारे समाज के असली नायक नायिकाओं की पहचान हमारी युवा और तरुण पीढ़ी को होना बहुत जरुरी है और इसी क्रम में आज हमें एक ऐसी महातपस्विनी से इन्हें परिचित कराना है जो महिला सशक्तिकरण का सर्वश्रेष्ठ भारतीय संस्करण हैं। जिन्होंने एक दो नहीं अपितु हज़ारों लोगों को सहयोग का ऐसा हाथ थमाया कि उन नन्हे कोमल हाथों ने उन्हें माँ के रूप में मान लिया, उन सैकड़ों महिलाओं ने उनमें दीदी रूप देखा जिनके सान्निध्य में उन्हें अपना जीवन सफल लगने लगा। प्रेम और करुणा की साक्षात प्रतिमूर्ति आदरणीय दीदी माँ ऋतंभरा हमारे समाज की भारतीयता में डूबी हुई एक ऐसी ही महान विभूति हैं, जिनके व्यक्तित्व के बहुआयामी गुणों से हम इस समाज को एक परिवार के रूप में देख सकते हैं, प्रेम कर सकते हैं, वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा को मूर्त रूप देने वाली दीदी माँ के बहुआयामी व्यक्तित्व का एक आयाम अयोध्या में कार सेवा के लिए लोगों को प्रेरित करने वाली एक सम्माननीय नेतृत्व का है तो दूसरे आयाम को आप वात्सल्यग्राम से समझ सकते हैं। 

वात्सल्यग्राम एक ऐसी परिकल्पना है जिसमें समाज के हर वर्ग के जरूरतमंद लोगों की सेवा की जाती है। एक परिवार के रूप में महिलाओं और बच्चों को साथ रखकर एक परिवार के रूप में उनका पालन, पोषण, शिक्षा, चिकित्सा और रोजगारपरक कार्यक्रमकों के माध्यम से उनके जीवन में उमंग और उल्लास भर संस्कारों को रोपा जाता है और वो भी निशुल्क। स्वयं दीदी माँ के शब्दों में, "हमारे बच्चे तुलसी के पौधे हैं जिन्हें संस्कारों से सींचा जाता है।" ऐसे विचारों के प्रसार और प्रचार की हमें बहुत आवश्यकता है, पुनः विश्व गुरु बनने के लिए। इस समाज को यदि एक सफल परिवार का रूप देना है तो हमें दीदी माँ जैसे किसी बहुमुखी नेतृत्व को स्वीकार उनका अनुसरण करना चाहिए। हमारे देश में दीदी माँ महिला सशक्तिकरण का सर्वोत्तम उदाहरण हैं। महिला सशक्तिकरण एक बहुत व्यापक और वृहद् विषय है। हमारे आदर्श हमारे अनुकरणीय वही हो सकते हैं जो हम जैसे हों, हमारे जैसे दिखते हों, हमारी तरह आचरण करते हों या जिनमें देशप्रेम की भावना हमारे जैसी ही हो। कोई विदेशी संस्कारों के अनुसार जीवन यापन करते कलाकार जिनकी मित्रता सीमाओं के परे है, जो कला को देश के सम्मान से ऊंचा समझे वो हमारा नायक कैसे हो सकता है। हमारे आचरण को शुद्ध करने के लिए, समाज के रुप में उन्नति के लिए अनुशासित एक माँ ही कर सकती हैं और दीदी माँ से बेहतर और कोई कैसे हो सकता है? जिनमें भारतीयता वसुधैव कुटुंबकम के रूप में बसती है, जो धर्म ध्वजा को बीते कई वर्षों से थामे हैं और सतत मुस्कुराहट के साथ असंख्य चेहरों को मुस्कुराहट दे रही हैं। 

 


ऐसे समय में जब महिला सशक्तिकरण का अर्थ इंडिया इंक में पलने बढ़ने वाली व्यावसायिक परिवारों की बेटियों और फिल्म अभिनेत्रियों को ही समझा जाने लगा, वहीँ ग्रामीण भारत इस तथ्य से बिलकुल अनभिज्ञ और अनजान ही रहा है। तरुण युवतियां हों या प्रौढ़ महिलाएं, भारतीय समाज में इनकी कोई स्पष्ट और मार्गदर्शक स्थिति कभी नहीं रहिओ है। ऐसे में पंजाब के एक शहर लुधियाना में जन्मीं एक साध्वी ऐसी भी हैं, जिन्होंने महिलाओं और बच्चों के जीवन उद्धार को ही अपने जीवन का सार बना लिया। ऐसी महान विभूतियों को भारत के मार्गदर्शक बनाने की इस समाज को बहुत आवश्यकता है। आदरणीय दीदी माँ चकाचौँध और वैभव से दूर अपने सरल जीवन पद्धति और ईश्वर के प्रचार प्रसार के कारण अपने अनुयायियों में सिर्फ लोकप्रिय हैं अपितु अनुकरणीय हैं। उन्हें विश्व को महिला सशक्तिकरण का भारतीय संस्करण कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति होगी।

 

हमारे समाज की एक बहुत बड़ी समस्या अपनी पहचान का संकट सदा सर्वदा रही है। हमारे समाज के रोल मॉडल्स हमेशा क्रिकेट के खिलाडी या अभिनेता/अभिनेत्रियां रहे हैं कोई बड़ा लेखक हो या समाज सुधारक, हमारे युवाओं का इनसे कोई परिचय नहीं रहा। इसलिए जरुरी है कि हम अपने नौनिहालों को और युवाओं को इस समाज के सच्चे सुधारकों से परिचित कराएं।

आदरणीय दीदी माँ ऋतंभरा का जीवन निर्बल और अनाश्रितों की सेवा में ही रहा है। वर्षों से सोये समाज को मानसिक गुलामी की बेड़ियों से आज़ाद करने के लिए दिए गए उनके ओजपूर्ण और प्रेरणादायी भाषणों के कारण दीदी माँ का सम्मान सदा सर्वदा रहा है। आज अयोध्या को उस बर्बर और लुटेरे विदेशी आक्रांता से मुक्त कराया जा रहा है और प्रभु श्री राम का भव्य और दिव्य मंदिर बनाया जा रहा है तो उसका श्रेय आदरणीय दीदी माँ को भी जाता है। 1989 से 1992 तक दिए गए उनके ओजस्वी और प्रेरणादायी संवाद का एक बहुत बड़ा रोल रहा उस मुगलिया गुलामी ढांचे के विध्वंस में।


श्रीराम जन्मभूमि कारसेवा उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का सिर्फ एक पहलू है। इसके अलावा दीदी माँ को अपने अथक प्रयासों से निराश्रित समाज की सेवा में वात्सल्यग्राम की स्थापना के लिए भी याद किया जाता है। समाज के जिन बच्चों को त्याग दिया जाता है, उन्हें वात्सल्य ग्राम में लाकर उनका लालन पालन प्रेमपूर्वक किया जाता है।  उनके सम्पूर्ण पोषण के लिए गौशाला की स्थापना भी इसी ग्राम में की गयी है। यहाँ ये भी ध्यान दिए जाने वाली बात है कि ये सिर्फ नौनिहालों तक सीमित नहीं है, समाज की तरुण युवतियों और प्रौढ़ महिलाओं को भी यहाँ एक परिवार के रूप में रखा ही नहीं जाता बल्कि उन्हें एक दूसरे के साथ माँ, दीदी, नानी के रिश्तों में बाँध उचित सम्मान और प्रेम दिया जाता है, जिसके वो अधिकारी हैं।

इसी वात्सल्य पूर्ण ग्राम में वैशिष्ट्यम नाम से एक सेवा प्रकल्प ऐसा भी है जिसमें उन बच्चों को रखा जाता और उनका इलाज किया जाता है जो मानसिक रूप से पूर्ण रूपेण विकास को प्राप्त नहीं कर सके। ऐसे ही बच्चों में कई ऐसे बच्चे भी हैं जो अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं में अवार्ड्स जीत चुके हैं। ऐसी ही एक गरीब परिवार की बेटी जिसने अबू धाबी में हुई खेल-कूद प्रतियोगिता में गोल्ड मैडल जीता था, उसके प्रोत्साहन हेतु सरकारी मदद दिलाई गयी।

 

यहाँ रहने वाली तमाम महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने हेतु सिलाई कढ़ाई और ब्यूटी पार्लर के कोर्स भी चलाये जाते हैं। इस प्रकार एक निराश्रित महिलाओं को समुचित ट्रेनिंग देकर आत्मनिर्भर बनाया जाता है। समाज में सम्मान की चादर ओढ़ कर दूसरों के समकक्ष खडा किया जाता है। मातृत्व सुरक्षा अभियान दीदी माँ के अथक प्रयासों का ही सुमधुर फल है जिसमे समाज के गरीब वर्ग की महिलाओं के कुपोषण की समस्या के लिए प्रयास किये जाते हैं और एनीमिया नामक समस्या से निजात दिलाई जाती है।

 

हज़ारों लोगों का निशुल्क तीनों समय का भोजन, निर्धन परिवार के बच्चों को मुफ्त आवास, स्वास्थ्य और उच्च श्रेणी की शिक्षा का जिम्मा, हर तीसरे महीने बृृजमंडल के हज़ारों लोगों का मुफ्त नेत्र शल्य चिकित्सा दीदी माँ के उस तप का ही परिश्रम है जिसमें समाज का एक बड़ा वर्ग उन्हें माँ और दीदी के उच्च आसान पर विराजता है, उनके श्री चरणों में अपना शीश नवा उन्हें साधुवाद करता है। ऐसी महान भारत भू की एक महान तेजस्विनी जिनके आभामंडल पर सदा सर्वदा तेज रहता है, आइये इस भारतीय समाज में अपनी जिम्मेदारी निभाएं, अपने बच्चों को ऐसे उच्च आदर्शों पर चलना सिखाएं, उन्हें बताएं कि महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ सिर्फ अपने जीवन को बेहतर बनाना ही नहीं होता, इसका भारतीय मूल्यों में अर्थ होता है, तमाम निराश्रित अधरों पर मुस्कुराहटें बिखेर देना जिनका कोई नहीं सिर्फ परमात्मा होता है क्यूंकि आदरणीय दीदी माँ के शब्दों में -

 

"विश्वनाथ की धरती में कोई अनाथ कैसे हो सकता है?"

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